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वैश्विक तेल संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियाँ और अवसर

  • Aug 25, 2025
  • 3 min read

भारत एक तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है, और इसी दृष्टिकोण से ऊर्जा सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है, विशेष रूप से वर्तमान समय में जब वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य अस्थिरता, भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित है, और यह स्थिति भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देशों के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे अजैविक स्रोतों पर निर्भर है; हाल ही में मध्यपूर्व में तनाव, यूक्रेन संघर्ष, लंबे समय तक चलने वाली आपूर्ति श्रृंखला बाधाएँ और कोविड-19 से उत्पन्न वैश्विक आर्थिक असंतुलन ने ऊर्जा बाजारों को और अधिक अस्थिर बना दिया है, जिसके कारण कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल, परिवहन लागत में वृद्धि और उपभोक्ता सस्ते ईंधन की मांग में भारी वृद्धि जैसी परिस्थितियाँ पैदा हुई हैं, और इन सबके बीच भारत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और कुछ अवसर मिल रहे हैं, जैसे कि लगातार ऊंचे तेल आयात बिल को नियंत्रित करना, घरेलू ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देना, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों—जैसे सौर, पवन, और बायो-ईंधन—का विस्तार करना तथा ऊर्जा दक्षता सुधारों को लेकर व्यापक प्रयास करना, जिससे ऊर्जा आयात पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सके; इसके अतिरिक्त भारत ने अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों में पैट्रोलीय उत्पादों की कीमतों को स्थिर रखने के प्रयास में रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने की पहल की है, जिससे समय-समय पर तेल की आपूर्ति में अचानक व्यवधान आने पर देश को कुछ हद तक राहत मिल सके, और साथ ही ऊर्जा मंत्रालय और पारेषण कंपनियों के बीच विद्युत क्षेत्र में ऊर्जा दक्षता को बढ़ाने के उद्देश्य से ‘चरम लोड प्रबंधन’ जैसी पद्धतियाँ अपनाई जा रही हैं, जिससे बिजली उत्पादन और वितरण की लागत को कम किया जा सके तथा ऊर्जा क्षति को रोका जा सके, जबकि इसके समांतर ऊर्जा संक्रमण (energy transition) को गति देने के लिए भारत ने अक्षय ऊर्जा में निवेश बढ़ाया है और नवीन तकनीकों—जैसे ग्रीन हाइड्रोजन, पवन-सौर हाइब्रिड सिस्टम, ऊर्जा भंडारण समाधानों (battery storage) तथा स्मार्ट ग्रिड तकनीक—की ओर कदम बढ़ाया है, जिससे बिजली में स्वच्छ और आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी सफलता मिली है; लेकिन साथ ही यह भी तथ्य है कि इन नीतिगत सुधारों और निवेशों को पूरी तरह से लागू करने में कई बाधाएँ हैं, जैसे भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाएँ, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता, तकनीकी विशेषज्ञता की कमी, नियामकीय स्पष्टता का अभाव और स्थानीय सामाजिक-आर्थिक विरोध, जिसके कारण अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो पा रहा है और इनके विश्वसनीयता की चिंता बनी रहती है; फिर भी भारत सरकार ने ऐसे उपायों को तेज़ किया है जिसके अंतर्गत निजी क्षेत्र, सार्वजानिक-निजी साझेदारी (PPP) मॉडल और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को ऊर्जा क्षेत्र में अधिक भूमि उपलब्ध कराने, कर छूट देने, पंजीकरण निविदा प्रक्रिया (e-procurement) सरल बनाने, और ग्रिड कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने जैसे माध्यमों के द्वारा प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे विदेशी निवेश आकर्षित हो और ऊर्जा परियोजनाएँ तेजी से पूरी हो सकें; इसके अलावा सरकार द्वारा ऊर्जा क्षेत्र में अनुसंधान-विकास को बढ़ावा देने हेतु महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम—जैसे जलवायु-स्मार्ट कृषि, ऊर्जा-सक्षम भवन अभियान तथा ऊर्जा-दक्षता मानकों (BEE) का ऊँचा स्तर—भी शुरू किए गए हैं, जिनका लाभ लंबी अवधि में ऊर्जा-खपत और खर्चों को कम करने के साथ-साथ पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है; इन प्रयासों के चलते हाल ही में भारत ने अपने ऊर्जा आयात बिल में कुछ स्थिरता देखी है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में विश्व स्तर पर भारत की वैश्विक रैंकिंग मजबूत हुई है, जबकि घरेलू तेल और गैस अन्वेषण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने स्मार्ट ड्रिलिंग तकनीक, विदेशी साझेदारियों और स्थानीय समुदायों को शामिल करने जैसी योजनाओं को लागू किया है, जिससे ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक स्थिर राह पर कदम बढ़ा है; अत: यह स्पष्ट है कि वैश्विक तेल संकट के बीच भी भारत ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करते हुए अवसरों की दिशा में अग्रसर है, जो दीर्घकालिक एवं स्थिर विकास की नींव रखने में सहायक सिद्ध होगा।

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