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डिजिटल युग में शिक्षा का नया स्वरूप : अवसर, चुनौतियाँ और भविष्य की दिशा

  • Aug 25, 2025
  • 3 min read

इक्कीसवीं सदी का युग डिजिटल क्रांति का युग है और इसका सबसे गहरा प्रभाव शिक्षा पर पड़ा है, क्योंकि शिक्षा ही वह आधार है जिस पर समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की नींव टिकी होती है। परंपरागत रूप से भारत में शिक्षा की व्यवस्था गुरुकुल और प्रत्यक्ष संवाद पर आधारित थी, जहाँ गुरु और शिष्य आमने-सामने बैठकर ज्ञान का आदान-प्रदान करते थे और यह प्रक्रिया केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी बल्कि इसमें नैतिक मूल्यों, अनुशासन और जीवन जीने की कला का भी समावेश होता था, किंतु समय के साथ तकनीकी विकास और वैश्वीकरण ने शिक्षा के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया। आज शिक्षा केवल विद्यालय या विश्वविद्यालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंटरनेट, स्मार्टफ़ोन और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँच चुकी है। डिजिटल शिक्षा ने ज्ञान को सुलभ और लोकतांत्रिक बना दिया है, क्योंकि अब कोई भी विद्यार्थी, चाहे वह महानगर में रहता हो या किसी छोटे गाँव में, इंटरनेट के माध्यम से वही सामग्री प्राप्त कर सकता है जो विश्वस्तरीय संस्थान उपलब्ध करा रहे हैं। ऑनलाइन शिक्षा के कई लाभ हैं जैसे – समय और स्थान की पाबंदी से मुक्ति, अपनी गति से पढ़ने की सुविधा, विभिन्न प्रकार के विषयों और पाठ्यक्रमों का विकल्प तथा अपेक्षाकृत कम लागत में उच्च स्तरीय शिक्षा तक पहुँच। कोविड-19 महामारी के दौरान यह और स्पष्ट हो गया जब पूरी दुनिया के स्कूल और कॉलेज बंद होने के बावजूद शिक्षा ऑनलाइन माध्यम से चलती रही और करोड़ों छात्रों ने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग कर पढ़ाई जारी रखी। हालांकि इसके साथ कई चुनौतियाँ भी हैं जैसे डिजिटल विभाजन, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के पास अब भी स्मार्ट डिवाइस और तेज़ इंटरनेट की कमी है; दूसरा, प्रत्यक्ष मानवीय संवाद की अनुपस्थिति जिसके कारण छात्रों में नैतिक मूल्यों और सामाजिक जुड़ाव की कमी हो सकती है; तीसरा, ऑनलाइन वातावरण में ध्यान केंद्रित रखना कठिन होता है और छात्र आसानी से सोशल मीडिया या अन्य एप्लिकेशनों की ओर आकर्षित हो जाते हैं; चौथा, सभी ऑनलाइन कोर्स की गुणवत्ता समान नहीं होती, जिसके कारण भ्रामक जानकारी और अप्रमाणिक स्रोतों की समस्या भी उत्पन्न होती है। इसके बावजूद शिक्षा में तकनीकी नवाचार निरंतर हो रहे हैं, जैसे स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल बोर्ड, वर्चुअल रियलिटी आधारित प्रयोगशालाएँ, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस द्वारा व्यक्तिगत शिक्षण अनुभव, बिग डेटा के माध्यम से छात्रों की प्रगति का विश्लेषण और 3D मॉडलिंग द्वारा जटिल विषयों की आसान व्याख्या। इन नवाचारों ने शिक्षा को न केवल रोचक बनाया है बल्कि इसकी पहुँच को भी व्यापक किया है। भविष्य में जब 5G और उसके बाद की तकनीकें पूरी तरह से लागू होंगी तो शिक्षा की गुणवत्ता और गति और भी अधिक बढ़ जाएगी। इसके अलावा, शिक्षा में तकनीक का एक और महत्वपूर्ण पहलू है कि यह जीवन पर्यंत सीखने (Lifelong Learning) की परंपरा को बढ़ावा देती है। पहले शिक्षा को एक निश्चित आयु तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब कोई भी व्यक्ति किसी भी उम्र में नए कौशल सीख सकता है, चाहे वह नौकरी के लिए हो या व्यक्तिगत रुचि के लिए। उदाहरण के तौर पर आज लाखों लोग ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर कोडिंग, डिज़ाइनिंग, संगीत, भाषाएँ और यहाँ तक कि व्यवसाय प्रबंधन सीख रहे हैं। इसी प्रकार डिजिटल युग ने विद्यार्थियों को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा करने का अवसर दिया है, क्योंकि ऑनलाइन माध्यम से भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों के कोर्स तक पहुँच पा रहे हैं और विभिन्न देशों के छात्रों के साथ संवाद कर पा रहे हैं। फिर भी यह याद रखना आवश्यक है कि तकनीक केवल साधन है, साध्य नहीं। यदि शिक्षा में मानवीय मूल्यों, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए तो केवल तकनीकी ज्ञान पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए भविष्य की शिक्षा व्यवस्था में आवश्यक है कि पारंपरिक और डिजिटल दोनों तरीकों का संतुलित उपयोग हो। डिजिटल उपकरणों से प्राप्त ज्ञान को व्यवहारिक जीवन से जोड़ने के लिए शिक्षक और छात्र के बीच प्रत्यक्ष संवाद भी उतना ही आवश्यक रहेगा। अंततः कहा जा सकता है कि डिजिटल युग में शिक्षा ने नए आयाम प्राप्त किए हैं, जिसने न केवल सीखने की प्रक्रिया को सरल और रोचक बनाया है बल्कि इसे सर्वसुलभ भी किया है। यदि तकनीक का उपयोग पारदर्शिता, गुणवत्ता और समान अवसर के साथ किया जाए तो यह शिक्षा को और भी सशक्त बनाएगी और भारत को ज्ञान आधारित समाज के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

 
 
 

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